मक्खन में किरकिर मिल गई...'महामहिप' हैरान

 मक्खन पेंदे बैठा, मट्ठा सिर माथे




सन्तोष खाचरियावास

अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती की निर्वाण स्थली अजमेर में उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय कहने को 'मठ' और असल में 'मट्ठा' बन चुका है। मक्खन तो मकोड़े सूत रहे हैं.. मट्ठा चींटियों के हिस्से! 

विश्वविद्यालय के नाम से लगता है कि यहां आर्य समाज के दस सिद्धांतों को तवज्जो मिलती होगी, आर्य संन्यासियों की संगत और गुरुकुल जैसी आबोहवा होगी...लेकिन ऐसा है कुछ नहीं। फिलहाल तो यहां आर्य समाजियों के नाम से ही तबीयत उमसभरी हो रही है। विश्वविद्यालय में स्थापित महर्षि दयानंद सरस्वती शोधपीठ खत्म किए जाने के मामले ने ऐसा तूल पकड़ रखा है जैसे मक्खन में किरकिर मिल गई हो...आर्य समाज का नाम कानों में पहुंचते ही विश्वविद्यालय प्रशासन के मुंह का जायका उड़ रहा है। मक्खन भरे मुंह से सिर्फ इतना ही निकल पा रहा है- मैया मोरी.. मैं नहीं शोधपीठ बंद करायो..!


सैकड़ों कॉलेजों को कंट्रोल करने वाले इस थाने में अब संतरी थोड़े और थानेदार ज्यादा हैं। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का झुनझुना बजाते रहो और तनख्वाह पकाते रहो। सेशन लेट से लेट हो रहा है। तीन साल में ग्रेजुएशन पूरी होने का सपना देख रहे स्टूडेंट्स डेढ़ साल में सिर्फ दो सेमेस्टर क्लीयर होने से चिंतित हैं। दूसरे विश्वविद्यालयों से इस विश्वविद्यालय का सेशन पीछे चल रहा हो, हजारों बच्चों की पीठ पर 'बैक' का बोझ लाद दो... किसी को कोई फर्क नहीं। बड़े बच्चों की कॉपियां छोटे बच्चे जांच रहे हों, कोई शर्म नहीं। जी भाई साहब कहते रहो, मजे में रहते रहो! 


रोजाना अखबारों में वही चार चेहरे, चार नाम...विश्वविद्यालय के चार पिलर ! विश्वविद्यालयों के सर्वोपरि कुलाधिपति यानी महामहिम हैं लेकिन यहां 'महामहिप' राज कर रहे हैं। संवैधानिक छड़ी से 'एंट्री- नो एंट्री' का खेल दिखाया जा रहा है।

नित नए एमओयू कर यह विश्वविद्यालय मानों शिक्षा जगत में क्रान्ति ला रहा हो लेकिन जिस अहम एमओयू की तत्काल जरूरत थी, उसे करने में एक साल लग गया। एनरोलमेंट के लिए करीब 30 हजार स्टूडेंट्स की ऑरिजनल मार्कशीट और दूसरे ऑरिजनल डॉक्यूमेंट्स विश्वविद्यालय के एक कमरे में पूरे डेढ़ साल तक पड़े रहे। उन्हें समय पर लौटाने का किसी को होश नहीं रहा। बच्चे अपने ऑरिजनल डॉक्यूमेंट्स खो जाने की आशंका से भयभीत रहे, कइयों को जरूरत पड़ने पर सीबीएसई और राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से डुप्लीकेट मार्कशीट बनवानी पड़ी। बाद में हल्ला मचने पर भारतीय डाक विभाग से एमओयू करने की सुध आई और डेढ़ साल बाद अब ये ऑरिजनल डॉक्यूमेंट्स कॉलेजों और स्टूडेंट्स के पते पर डाक से भिजवाए जा रहे हैं।

अब एक और कमाल...

बच्चों की कॉपियां बच्चों ने जांची...हल्ला मचने पर सम्बंधित परीक्षक को भेजी गई बीए प्रथम वर्ष द्वितीय सेमेस्टर इतिहास की

कॉपियां दुबारा जंचवाने, सम्बंधित परीक्षक को डिबार करने और पुलिस में मामला दर्ज कराने की घोषणा के कुछ दिन बाद ही 29 जनवरी को परिणाम घोषित भी कर दिया गया। बच्चों ने मार्कशीट और परिणाम डाउनलोड भी कर लिया। क्या उन कॉपियों की दुबारा जांच हो गई ? या उनको छोड़कर शेष का परिणाम जारी किया गया? इन सवालों के जवाब के लिए जब खबरनवीसों ने विश्वविद्यालय में परीक्षा का जिम्मा संभालने वाले एक बड़े अधिकारी को फोन लगाया तो उसका जवाब चौंकाने वाला था- अभी रिजल्ट नहीं आया है!


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