पेट्रोल की कीमतों में लूट का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, पेट्रोलियम कम्पनियों में हड़कम्प
जनहित याचिका में 20 प्रतिशत इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल नीति को चुनौती
नई दिल्ली। इथेनॉल की आड़ में आम जनता से करोड़ों रुपए की ठगी को लेकर 'न्यूज नजर' ने जो जंग छेड़ी थी, अब वह व्यापक रूप लेती नजर आ रही है। केंद्र सरकार की इथेनॉल मिश्रण योजना को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई है। इससे पेट्रोलियम कंपनियों में हडकंप मच गया है।
केंद की मोदी सरकार ने विदेशी मुद्रा बचाने का जुमला देकर देशभर में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिले पेट्रोल (E20) की बिक्री अनिवार्य कर दी है। पहले शुद्ध पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथेनॉल मिलाकर बेचा जाने लगा। लेकिन बदले में पेट्रोल के रेट कम नहीं किए। कहीं से कोई विरोध नहीं होने पर मोदी सरकार ने इथेनॉल की मात्रा बढ़ाकर 13 प्रतिशत और फिर 15 प्रतिशत कर दी। अब देश में इस साल जुलाई में ही 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया, जबकि यह लक्ष्य 2028-29 तक रखा गया था। पेट्रोल में 20 फीसदी मिलावट होने से ग्राहकों के वाहन जल्दी जल्दी खराब हो रहे हैं। माइलेज घट गया है। हालांकि पेट्रोल आयात करने में जो डॉलर खर्च हो रहे थे, उनमें कमी आई, यानी विदेशी मुद्रा बचने लगी लेकिन इसका फायदा किसे मिल रहा है, यह मोदी सरकार स्पष्ट नहीं कर रही है। कायदे से पेट्रोल के दाम घटने चाहिए थे लेकिन सरकार अब भी दो साल पहली वाली दरों पर पेट्रोल डीजल बेच रही है। पेट्रोलियम कम्पनियों की मौज हो रखी है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला
जाने माने अधिवक्ता अक्षय मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका में कहा है कि जन जागरूकता अभियान चलाए बगैर केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया ऐसा कार्यक्रम (ई-20 पेट्रोल) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 के तहत उपभोक्ताओं के सूचित विकल्प के अधिकार का उल्लंघन करता है। लाखों भारतीय वाहन चालक/मालिक इस बात से अनजान हैं कि उनके वाहनों में इस्तेमाल होने वाला पेट्रोल 100 फीसदी पेट्रोल नहीं, बल्कि इथेनॉल और पेट्रोल का मिश्रण है। इतनी अहम जानकारी छुपाना उपभोक्ता की सूचित पसंद (इंफॉर्मड चॉइस) को खत्म करता है।
याचिका में कहा गया है कि उपभोक्ताओं को इथेनॉल-फ्री पेट्रोल (E0) का विकल्प दिए बिना सिर्फ E20 उपलब्ध कराना उन करोड़ों वाहन मालिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिनके वाहन इस तरह के पेट्रोल के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
याचिका में यह भी कहा गया है कि E20 पेट्रोल का इस्तेमाल करने से वाहन की फ्यूल एफिशिएंसी (माइलेज) घटती है और कई पुर्जों में जंग लगने का खतरा बढ़ जाता है। इससे उपभोक्ताओं पर रखरखाव का अतिरिक्त खर्च और सुरक्षा से जुड़े खतरे भी पैदा होते हैं। अधिवक्ता मल्होत्रा का तर्क है कि जब तक वाहन निर्माता कंपनियों को E20 के अनुकूल गाड़ियां बनाने और बाजार में उतारने का पर्याप्त समय न दिया जाए, तब तक इस नीति को लागू करना अनुचित और मनमाना कदम है।
याचिका के मुताबिक अप्रैल 2023 से पहले बनी गाड़ियां इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के लिए उपयुक्त नहीं हैं। यहां तक कि दो साल पुरानी गाड़ियां भी, भले ही वे बीएस-6 मानकों के अनुरूप हों, 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण के लिए सही नहीं हैं। वे अधिकतम 10 प्रतिशत इथेनॉल मिले पेट्रोल (E10) तक ही चलने लायक हैं।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई है कि पेट्रोलियम कंपनियों को आदेश दिया जाए कि वे बाजार में इथेनॉल-फ्री पेट्रोल (E0) भी उपलब्ध कराते रहें। इसके अलावा पेट्रोल पंपों पर यह स्पष्ट लिखना भी अनिवार्य किया जाए कि वहां मिलने वाला पेट्रोल E20 है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जबकि पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाया जा रहा है, इसका फायदा उपभोक्ताओं को कीमत में कमी के रूप में नहीं मिला है। उन्होंने याचिका में यह भी उल्लेख किया है कि अमरीका और यूरोपीय संघ जैसे देशों में आज भी इथेनॉल-फ्री पेट्रोल उपलब्ध है और वहां पेट्रोल पंपों पर स्पष्ट लेबलिंग होती है। जिससे उपभोक्ता अपनी पसंद के अनुसार पेट्रोल चुन सकें।
यह भी देखें : बाइक की टँकी में पेट्रोल अपने आप बन गया पानी
यह भी देखें : अमित शाह की रैली के बहाने करोड़ों के पेट्रोल डीजल की बंदरबांट
पेट्रोल में इथेनॉल मिलावट का खेल, कइयों के वारे-न्यारे
'न्यूज नजर' की पड़ताल में पहले ही खुलासा किया जा चुका है कि पेट्रोल में कितने फीसदी इथेनॉल मिलाया गया है, यह चैक करने के लिए पेट्रोल पंपों पर कोई मशीन या टेस्ट सुविधा उपलब्ध नहीं है। पेट्रोलियम कम्पनी के टर्मिनल में जबरदस्त खेल हो रहा है। जिन पेट्रोल पंप मालिकों से मोटी रिश्वत मिलती है, उनके यहां प्योर पेट्रोल की सप्लाई भेज दी जाती है और उनके हिस्से का बचा इथेनॉल अन्य पेट्रोल पंपों की सप्लाई में मिलाकर भेज दिया जाता है। यानी पेट्रोल की सभी टीटी (टैंकर) में समान मात्रा में इथेनॉल मिश्रित नहीं किया जा रहा है। शहर के एक पेट्रोल पंप पर ज्यादा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल बिकता है तो दूसरे पर बिल्कुल प्योर।
प्योर पेट्रोल बेचने वाले पंप मालिक को यह फायदा होता है कि उसके यहां ग्राहकों की कतारें लगी रहती हैं। जबकि दूसरे पंप पर बिक्री कम होती है। ग्राहक उसी पंप से पेट्रोल खरीदते हैं, जहां से उन्हें ज्यादा माइलेज मिलता हो और गाड़ी में खराबी भी नहीं होती हो। ग्राहकों की इसी फितरत को भांपकर चालाक पेट्रोल पंप मालिक पेट्रोलियम कम्पनी के टर्मिनल में अधिकारियों से मिलीभगत कर लंबे समय से अपने यहां प्योर पेट्रोल की सप्लाई मंगवा रहे हैं।
एचपीसीएल कबूल भी कर चुका
भारत की सबसे बड़ी सरकारी तेल कम्पनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लि. से 'न्यूज नजर' ने आरटीआई में कुछ सूचनाएं एकत्र की। उनमें कम्पनी ने कबूल किया कि कई बार टर्मिनल से प्योर पेट्रोल की सप्लाई दी जाती है। साथ ही एचपीसीएल ने यह भी कबूल किया कि उसके पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा चैक करने के लिए कोई मशीन या टेस्ट सुविधा नहीं है। इससे इस घोटाले की पुष्टि होती है।



Comments
Post a Comment